*महफ़िल* की जाजम बिछाई-- आपको आवाज़ भी लगाई कुछ आये--देखे,और बिन कुछ कहे चल दिए कुछ ने आवाज सुनी अनसुनी कर दी--- क्यों? ये ख़ामोशी कैसी है? कुछ अपनी कहते कुछ औरो की कहते और इस महफ़िल की जाजम को गांव की चौपाल सी बना देते कुछ ऐसे लगता कि हम गांव की उस रेत पर बैठे है जो धोरों से उड़ उड़कर आती जाती रहती है बिलकुल यादों की तरह। क्या नहीं चाहते महफ़िल को दिल की चौपाल बिलकुल गांव की तरह बनाना इस बार खामोश मत रहना मन की कहना अन्यथा फिर महफ़िल मुश्किल लगने लगेगी और जाजम फिर बोझ सा बन जायेगी इसलिए कहता हूँ कलम के पथिकों दिल को हल्का रखो कहते चलो--लिखते चलो उतार दो बोझा दिल का इस जाजम में-उस चौपाल में और धोरों की उस रेत के महीन कणों को देखो हथेली में और आँख में पड़ जाने का फर्क समझो किरकिरी जब कभी मुंह में आती है तब--- महफ़िल कहकहों की हो किरकिरी की नहीं तुम्हारी चुप्पी किरकिरी जैसी होगी और तुम्हारी कलम कहकहों सरीखी होगी अब फैसला तुम्हारा आमंत्रण मेरा। देखना है क्या करते हो?