॥तुम॥ तुम , मुझमें जीती हुई भाषा प्रीत की आलौकिक अहसास है मुझे कि मैं उतना ही पूर्ण हूँ तुमसे , जितनी माँ पार्वती शिव से , मीरा कृष्ण से , नदियाँ पानी से , तितलियाँ पुष्प पराग से, बसंत झरे हुए पारिजात से, सप्तर्षि तारामंडल आकाश से , कहाँ न तुमसे अन्तर्श्चेतना हो जीती हुई मेरी ,लौकिक प्रीत का तुम.. :निर्मला सिवानी