मुक़दमा-ए-चम्पई चम्पा ..🍃 अलसायी अमलतास दोपहरी में मैं महका महका चम्पा.. बहक कर, इस गुलाबी शहर में गुलाबी हुआ जाता हूँ.. इक तप्तकांचनवर्णा , चुस्त सुबह अपनी खिड़की से.. तांक झांक तांक झांक करती हैं और मेरा चम्पई रंग चुरा.. साँझ में जब मन्दिर के घण्टियाँ बजतीं है.. तब मेरे साये में चल चल के मेरी ख़ुशबू से सराबोर होती हैं मी लार्ड..🍃 : निर्मला सिवानी