गर दिल को
दिल से कहना हो
भारी मन को
हल्का करना हो
या फिर कोई पैगाम देना हो
किसी को आवाज देनी हो
कभी खामोश भी रहना हो
खामोशी में भी कहना हो
कुछ शरारतों का मन हो
कही हसरतों की गली तंग हो
कभी खुद की खुद से जंग हो
चाहतों का खिला कही रंग हो
कभी इजहार करना हो
कभी इंकार करना हो
दिल की राहों पर चलते चलते
गर कोई करार करना हो
या फिर किसी को बेकरार करना हो
प्यार भरी तकरार करनी हो
या फिर किसी से मनुहार करनी हो
चले आइये मेरी *महफिल* में
जहां शब्दों से दिल की पाती लिखी जाती है
और अपनत्व के अधिकार से पढ़ी जाती है।
लिखिये अपने मन की
पढ़िए उनके दिल की
गर आप चाहे तो
शब्दों का महाकुंभ
इस चौपाल में हो सकता है।
चले आइये-----
संजय सनम
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