भटकता हुआ राही!! बबीता अग्रवाल कंवल मैं राही! भटकता हुआ राही! मृगतृष्णा लिए भटक रहा हूं, तलाश है जाने किस जहां की ढूंढता हूँ, अंजान हूँ, नाकाम हूँ, हैरान हूँ, परेशान हूँ !! मैं राही! भटकता हुआ राही! माँ की गोद से खुले आंगन में, उन्मुक्तता से विचरण को आतुर। नन्हें हाथों में किरणें सूरज कि हर पल भरने को व्याकुल ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बच्चों के झुंड, हो गए कहीँ गुम चेहरों से खो गए सितारों के भी गुण ! बचपन गंवाया पुस्तक के ढेर में, मिला न वक्त,आँखमिचौली के खेल में। मैं राही! भटकता हुआ राही! मस्ती में डूबा, ज़िंदगी को ढूंढा, कालेज से निकला, नौकरी को भागा। सुकून कि चाह में, गृहस्थी सजाई ज़िंदगी की सच्चाई समझ में न आई ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बनाने की चाह में स्वयं को ही खोया, बच्चों का भविष्य रातों संजोया। लाठी की थाप और झुकी हुई कमर उम्मीद की किरण हो गई बेअसर! मैं राही! भटकता हुआ राही मैं राही! भटकता हुआ राही बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)
Nice pic. Very good job work .Ese munch se har lady ko apni pratibha dikhane ka mauka milta hai. Nhi to kavya to aajkal gum sa ho gya hai. Delhi
ReplyDelete