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मोहब्बत का यह चलन है!

यह कैसी अगन है!



है आलम बारिश, का फिर भी तपन है
कोई तो बताए, यह कैसी अगन है ।
जिंदगी तन्हा ही कटने लगी है,
चाहतें खुद में सिमेटने लगी है ।
लगी कैसी ये तुझसे लगन है ,
है आलम बारिश का फिर भी तपन है।
इस तपिश को क्या समझेगा कोई ?
अपनों ने ही तो आग है लगाई ।
लगी कैसी ये उनसे लगन है।
है आलम बारिश का, फिर भी तपन है।
चाह कर भी उनसे ,दूर न जा पाते हम।
दूर जा के भी, करीब आ जाते हैं हम।
लगी न जाने कैसी उनसे लगन है।
है आलम बारिश का फिर भी तपन है।
जलाकर अरमानो को मेरे ,वो मुस्कुराते है
देखकर मुझको वो, अब नजरे चुराते है।
मोहब्बत का शायद ये ही चलन है।
है आलम बारिश का फिर भी तपन है।

अर्चना शर्मा नेपाल

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