कभी स्त्री बन मिलो भी तुम
सब कुछ देकर भी रीतती नहीं हूँ मैं
सब कुछ पाकर भी भरते नहीं हो तुमकब तक बने रहोगे पुरुष,
कभी स्त्री बन मिलो भी तुम
बहुत है अनछुआ है अब तक
हर बार देह को ही छूते आए हो तुमशायद अंतस का प्रेम तुम्हे रास नहीं आता
इसलिए स्त्री बनने से इंकार हैं तुम्हें
कब तक बने रहोगे पुरुष,
कभी स्त्री बन मिलो भी तुम
अरे! कैसे बनोगे स्त्री तुम,
क्योकिं लज़्ज़ा जो आती स्त्री अस्तित्व सेएक स्त्री से ही जन्म लेके,
उसको ही कमतर समझने की
भूल जो कर बैठे हो तुम ??
कब तक बने रहोगे पुरुष,
कभी स्त्री बन मिलो भी तुम
प्रेम की भाषा कोई विद्या नहीं
स्त्री सिर्फ देह नहींस्वीकार करों दिल से तो कोई भेद भी नहीं
कह देते हो स्त्री को समझना मुश्किल हैं
पर जितना सरल स्त्रित्व को समझना हैं
उतना तो सांसे लेना भी नहीं
कब तक बने रहोगे पुरुष,
कभी स्त्री बन मिलो भी तुम

बेहतरीन
ReplyDelete