Skip to main content

आशु भाषण प्रतियोगिता का आयोजन

“साहित्यिकी” द्वारा  युवा विद्यार्थियों के लिए आशुभाषण प्रतियोगिता का आयोजन

कोलकाता: २२ जनवरी,२०२०


सुप्रसिद्ध साहित्यिकी संस्था द्वारा बुधवार, २२ जनवरी  को भारतीय भाषा परिषद् के सभाकक्ष में    राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की १५० वीं जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए आयोजित आशुभाषण प्रतियोगिता में युवा छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। निर्णायक मंडली में विद्या भंडारी, सविता पोद्दार एवं रेवा जाजोदिया शामिल रहीं। वाणीश्री बाजोरिया ने कार्यक्रम का कुशल संचालन करके हुए गाँधी जी को दुर्लभ व्यक्तित्व बताया।युवा प्राध्यापक और लेखक वीरेन्द्र सिंहजी ने ' गाँधी- किताबों से जिंदगी तक' विषय पर अपने प्रभावशाली विचार प्रस्तुत किए।उन्होंने गाँधी रचित पुस्तक 'हिन्द स्वराज'  का उल्लेख करते हुए उसे मौलिकता का प्रमाणपत्र बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता अमिता शाहजी ने की| उन्होंने गांधीजी को आकाशदीप कहते हुए आधुनिक युवा पीढ़ी को उनका अनुकरण करने की सलाह दी|सभा  में उपस्थित सरोजिनी शाह,विद्या भंडारी ,प्रमिला धूपिया, वसुंधरा मिश्र, बबीता माँधणा, संगीता चौधरी, मंजू रानी गुप्ता, रेवा जाजोदिया, वाणी मुरारका, शशी परसरामका, उषा श्रॉफ, सुषमा हंस, मीना चतुर्वेदी, पुष्पा लोढ़ा, सविता पोद्दार आदि सदस्यों ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई| आशुभाषण प्रतियोगिता में आयूश चतुर्वेदी ने प्रथम ,स्वाति प्रजापति ने द्वितीय और गुनगुन जयसवाल ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। अंत में सचिव गीता दूबेे ने सभी का आभार व्यक्त किया |


Comments

Popular posts from this blog

कही पर दिल लगाया जा रहा....

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण की महत्ता को जानिये   SANJAY SANAM Author + FOLLOW जैन धर्म की संस्कृति में प्रतिक्रमण की जो महत्ता है उसके कारण क्या है--इस प्रतिक्रमण की परंपरा की जय दर्शन में आगम सम्मत व्याख्या में सवाल जवाब के क्रम से आप तक पहुंचा रहे है- यह हमको जैन दर्शन के विद्वान श्री रमेश जैन सांगली के दुआरा संचालित व्हाट्स एप समूह से मिला है।यह जानकारी मूल्यवान है क्योकि इसके अंदर सवालों के तार्किक समाधान दिए गए है जो जैन संस्कृति की आत्मा को परिभाषित करते है। इनको समझने के साथ फिर जैन संस्कृति की गहराई को समझना भी आसान हो जाता है और हमको भी अपने जीवन को समझने के अनमोल सूत्र मिल जाते है। आइये जैन परंपरा के अनमोल सूत्र प्रतिक्रमण को समझने के लिए जिज्ञासा के समंदर में उतरते है। प्रश्न 1: प्रतिकमण किसे कहते हैं ? Jansatta उत्तर 1: हम अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण करके अपनी स्वभाव दशा में से निकलकर विभाव दशा में चले गए थे तो पुनः स्वभाव रूप सीमाओं में प्रत्यागमन करना प्रतिकमण है। जो पापकर्म मन, वचन, और काया से स्वयं किये जाते हैं, दूसरों से करवाएं जाते हैं और दूसरों के द्वारा किये हुए पाप...

राही की भटकन..

भटकता हुआ राही!! बबीता अग्रवाल कंवल मैं राही! भटकता हुआ राही! मृगतृष्णा लिए भटक रहा हूं, तलाश है जाने किस जहां की ढूंढता हूँ, अंजान हूँ, नाकाम हूँ, हैरान हूँ, परेशान हूँ !! मैं राही! भटकता हुआ राही! माँ की गोद से खुले आंगन में, उन्मुक्तता से विचरण को आतुर। नन्हें हाथों में किरणें सूरज कि हर पल भरने को व्याकुल ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बच्चों के झुंड, हो गए कहीँ गुम चेहरों से खो गए सितारों के भी गुण ! बचपन गंवाया पुस्तक के ढेर में, मिला न वक्त,आँखमिचौली के खेल में। मैं राही! भटकता हुआ राही! मस्ती में डूबा, ज़िंदगी को ढूंढा, कालेज से निकला, नौकरी को भागा। सुकून कि चाह में, गृहस्थी सजाई ज़िंदगी की सच्चाई समझ में न आई ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बनाने की चाह में स्वयं को ही खोया, बच्चों का भविष्य रातों संजोया। लाठी की थाप और झुकी हुई कमर उम्मीद की किरण हो गई बेअसर! मैं राही! भटकता हुआ राही मैं राही! भटकता हुआ राही बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)