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-फर्ज निभाते डॉक्टर की प्रेम कहानी

कोरोना से संघर्ष...

*A LOVE STORY*


           

दिव्यान्शी आज से ही क्वारटाइन में थी । अंश का भी क्वारटाइन शुरू हो गया था। दिव्यांशी सोच में बैठी थी कि अकेले अंश के बिना ये 14 दिन कैसे गुजरेगें।
अपनी शादी के बाद से ही दोनो कभी भी एक दिन के लिये भी अकेले नहीं रहे थे। ये 14 दिन दोनों को  सालों जैसे लग रहे थे। कुछ महीने पहले ही तो दोनो की शादी हुयी थी। दोनों ही पेशे से डाक्टर थे।
शादी के बाद अंश बाहर जाने का प्लान बना ही रहा था कि ये करोना नामक विलेन ने उनकी शान्त खुशहाल ज़िन्दगी मे भूचाल ला दिया। दोनों की ही सारी छुट्टियाँ कैन्सिलकर दी गई।
      दिव्यांशी और अंश ने भी हालात की मॉग और जरूरत देखते हुये पूरे तत्परता और समर्पण के साथ करोना पीड़ित मरीजो की इलाज में लग गये थे। अब तक दोनों 200 से ज्यादा करोना के मरीज़ो को इलाज कर चुके थे। कितनी मासूम थी वो 15 साल की बच्ची जिसकी मौत दिव्यांशी के सामने करोना से हो गयी थी।
 उस बच्ची के  मौत ने उसे बुरी तरह से उसका आत्मविश्वास हिला दिया था। जब जब दिव्यांशी को वो बच्ची की मौत याद आती उसकी रूह तक सिहर जाती उसे लगता कि मैं अब कभी भी  अपने अंश से नहीं  मिल पाउँगी और वह परेशान हो जाती। वैसे तो दिन में रोज कई बार फोन पर उसकी अंश से बात हो जाती थी और वह हिम्मत भी देता।
          धीरे धीरे वक्त गुजरता जा रहा था,जब जब दिव्यांशी परेशान होती थी ,अंश उसे समझाती और जब अंश परेशान होता तो दिव्यांशी उसे समझाती। दोनों एक दूसरे की कमजोरी भी थे ताक़त भी थे और हिम्मत भी। दोनों एक दूसरे को हिम्मत देते कि परेशान मत हो हम मिलेंगे और जल्दी ही मिलेगें।
    आज दोनों का क्वारटाइन खत्म होने को था। दोनो ने करोना टेस्ट के लिये अपने अपने सैम्पल दिये थे। दोनों के मन मे एक विश्वास तो था कि रिपोर्ट नेगेटिव ही आयेगा लेकिन साथ ही थोड़ा डर भी लग रहा  था  कि जाने क्या होगा।
          थोड़ी देर बाद अंश अपने हाथो में दोनों का रिपोर्ट  लिये दिव्यांशी के सामने खड़ा था। दिव्यांशी को पता नहीं था कि रिज़ल्ट क्या है, उसकी धड़कन बढ़ गयी थी , साँसें थम सी गई थी। अंश को इतने दिनों बाद अपने सामने देख कर दिव्यांशी को खुद को रोकना बहुत मुश्किल हो रहा था। तभी अंश ने अपनी बाँहो को फैलाते हुये उसे बताया कि दोनों की रिपोर्ट  नेगेटिव आयी है और वह घर चल सकते हैं। ये  सुन कर दिव्यांशी के ऑखों से खुशी के आँसू  निकल पड़े और वह अंश के बाहों में समा गई।
-नीलम वंदना(भोपाल)

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