अम्फान से मेरी बात
ओ *अम्फान* !
अनाहूत पाहुनक्यों उत्सुक हो तुम
यहाँ आने के लिए....
बसे हैं बहुत लोग
समुद्र तट परशरण लेनी पड़ेगी उनको
किसी आश्रय स्थल पर....
चिन्तित हैं मछुआरे
मुँह बाये खड़ा हैरोजी-रोटी का सवाल
कहाँ जायेंगे वे सब....
यूँ भी नचा रहा है
कोरोना यहाँ-वहाँकैसे रह पायेगी
सोशल डिस्टेन्सिंग....
गिन रहा है अन्तिम साँसें
मास्क लगाये हुएहरिया का बूढ़ा बापू
न जाने क्या होगा....
पूरे दिनों से हैं चंदु की बहू
कैसे जायेगीबिन सैनेटाईज किये हुए
जर्जर अस्पताल में....
कहाँ बचेगी अब
कान्हू की झोंपड़ीक्या खायेंगे भूखे बच्चे
टिप-टिप पानी में....
चूल्हा ठंडा होगा
नुक्कड़ वाली दुकान काबहुत रूलायेगी लोगों को
चाय-पान की तलब....
क्यों चले आते हैं प्रत्येक वर्ष
तुम्हारे भाई-बहनकिसे सुहाते हैं भला
ये देशी-विदेशी नाम वाले....
माना कि
मुश्किलें तो कुछ कम नहींपर हमें हरा सके
किसी में भी इतना दम नहीं....
आये और गये यहाँ
न जाने कितने ही चक्रवात
वन्दे उत्कल जननी में
खिले हैं सदैव पुष्प-पात...!!

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