जिओ ओर जीने दो का संदेश है पर्यूषण
जैन धर्म मे भगवान महावीर की अहिंसा का पर्व जिओ औऱ जीने दो--क्षमा वीरस्य भूषनम अर्थात क्षमा वीरों का श्रृंगार है अर्थात जैन धर्म मे अहिंसा,क्षमा,दया की त्रिवेणी संगम का विराट रूप सहजता से देखा जा सकता है। संवत्सरी यह पर्व खास है क्योकि 8 दिन के उत्सव में जप,तप,त्याग,तपस्या के अदभुत कीर्तिमान यहां देखने को मिलते है-छोटे छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक तपस्या अर्थात कई दिनों के उपवास एक साथ करते है इस अवसर पर अठाई अर्थात आठ की तपस्या पर्यूषण पर्व के इन प्रमुख दिनों में करने का प्रावधान रहता है।
संवत्सरी के विशेष दिन प्रायः सभी लोग उपवास करते है इस खास दिन मन वचन काया से किये गए कर्मो के लिए 84 लाख जीव योनियों से क्षमा मांगी जाती है अर्थात जन्म जन्मांतर के कर्मो से यह मुक्ति की आराधना हैतप,त्याग,साधना से कर्मो की निर्जरा होती है अर्थात पाप कर्मों के क्षय का यह मार्ग बताया जाता है।
जैन धर्म मे जीव दया और क्षमा का बड़ा महत्व है -जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर की अहिंसा के मूल मंत्र पर जैन धर्म है जो बाहरी पर्यावरण के साथ मनुष्य के आंतरिक पर्यावरण को ठीक करने का सीधा संदेश देता है।शायद इसलिए विश्व शांति में जैन धर्म की महत्ता स्पष्ठ परिलक्षित होती है।
जिस तरह से वैदिक सनातन पर्व दीवाली,होली व मुस्लिम पर्व ईद पर आपस मे मनमुटाव को मिटाकर गले मिलना अर्थात आपसी विवाद को मिटाकर पुनः मैत्री पूर्ण सम्बन्ध बनाने की रस्म का बड़ा महत्व है ठीक उसी प्रकार जैन धर्म मे इसे अगर मैत्री पर्व भी कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा क्योकि पर्यूषण पर्व पर मन की मैत्री बहुत महत्वपूर्ण है
यहां क्षमा मन की आंतरिक गहराइयों से लेने व देने का विधान है।84 लाख जीव योनियों से प्रतिक्रमण की परंपरा से सुबह- शाम नियमित जिस धर्म मे क्षमा ली व दी जाती हो उस धर्म मे क्षमा ,दया,मैत्री के भावों की गहराई को स्वतः ही समझा जा सकता है इसलिए पर्यूषण क्षमा पर्व के रूप में विख्यात है ।
जैन धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय के इस पर्व को मनाने की अपनी अपनी परंपरा हो सकती है पर मूल आधार में भगवान महावीर की वाणी अर्थात उनके उपदेश ही रहते है।जैन धर्म मे आगम को भगवान की वाणी के रूप में पढ़ा व कहा जाता है।
दिगंबर सम्प्रदाय का दस लक्षण पर्व अपनी खास परंपराओं के साथ होता है पर समस्त जैन सम्प्रदाय के आचार्य,साधु,साध्वी समाज भगवान महावीर की अहिंसा,क्षमा,दया,मैत्री के इन प्रमुख स्तंभों के साथ जप,तप,त्याग,तपस्या,साधना के उपदेश अपने स्थानक में देते है।
आलेख: संजय सनम( please like,share,follow me..)
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