कोरोना एक सबक
आह कोरोना, वाह कोरोना,कमाल हो भाई कोरोना। हम सबकी हवा टाइट कर दी। चारों तरफ हाहाकार । सारे उपाय बेकार ।
दुनिया लड़ रही है- हम और आप भी। इस महामारी युद्ध में असंख्य बलिदान हो रहे हैं। घर परिवार और समाज, संकट सबके सामने है। सरकारें चुनौती के आगे सेनापति बनी रणनीति बनाकर खड़ी है। किसी ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। पर नतीजा वही- ढाक के तीन पात।
सरकारें नसीहत दे देकर तक गई। प्रशासन, पुलिस, डॉक्टर्स सभी कार्य कर्ता कमर कसे लड़ रहे हैं और बचने के उपाय सुझा रहे हैं।
इतना लंबा समय गुजर गया, प्रकृति का विद्रूप रुप कुछ तो कह रहा है। ये धरती,आकाश, पूरा ब्रह्मांड ऐसे ही तो चेतावनी नहीं दे रहे हैं। अगर हम संभले नहीं, समझे नहीं तो भुगतना भी हमें ही पड़ेगा। पर्यावरण के नाम पर सिर्फ नौसिखिए, रटे-रटाए किताबी जुमलों से काम नहीं चलेगा। अपने भीतर की तिजोरी को भी टटोलना होगा। कथनी करनी को एक बनाकर ही सुलगते संसार को बचाया जा सकता है।
ऐसी भीषण महामारी कभी किसी सदी में नहीं आयी होगी। इसका रौद्र रूप अभी पूरी तरह से हमारे सामने नहीं आया है। इसके भयानक परिणाम से बचाने के लिए सभी को जागरूक होकर फैसला लेना होगा। सिर्फ प्रशासन, पुलिस, डॉक्टर्स का ही ये काम नहीं है। वो भी कोई भगवान नहीं है । और कर्म तो हमारे अपने ही हैं। और बड़ा होने पर तो मां भी अपने बच्चे को गोद से उतार देती है। रोजी-रोटी तो सबकी जरूरत है। फिर सिर्फ दूसरे का ही आसरा क्यूं ?
संभलकर रहना ही एकमात्र उपाय है। जरूरत मंदों को उचित सहायता जरुर दी जाए। मगर अति सब जगह बुरी है। मुफ्तखोरी भी अपने फन उठाकर मुंह का निवाला छीनते देर नहीं लगाती। अपनी सारी आकांक्षाओं और इच्छाओं के लिए सिर्फ सरकार की ओर ही मुंह फाड़कर न देंखें। हमारी अपनी जिम्मेदारी भी इस संकटकाल में है।
थोड़ा सा स्वाभिमानी बने और स्वावलंबी भी। सरकार से उम्मीदें भी है, आशाएं भी। पर इतने बड़े संकटकाल में हद से ज्यादा उपाय करने के बाद भी सारी सुविधाएं जुटाना कैसे संभव है। और ये सब आपकी आशाओं के अनुरूप हो, बहुत मुश्किल है। हमें ही संकटकाल से देश को और प्रकृति को उबारने में अपना सहयोग देना होगा। उन बुद्धिजीवियों की सुन-सुनकर तो हम हलाल ही होंगे जो सिर्फ भावनाएं भड़काने का भंडारा लगाते हैं।
देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को जाने,समझें। खामियां जरूर ढूंढें मगर बेहतरी के लिए। आपसी सहयोग और सामंजस्य से काम लें।आपस का विश्वास समाधान की पहली शर्त है।
अफरा तफरी का माहौल पैदा करने वाले पहले हमारे ज़रूरतमंदों की समुचित व्यवस्था करने में अपना योगदान अवश्य दें। जागृत सरकार हर बार समय समय पर कई तरह की व्यवस्थाओं और सुविधाओं की घोषणा करती है। इन सबको जाने और अपने आप को इन व्यवस्थाओं से जोड़ने की समुचित व्यवस्था करें । आजकल
ई-नेटवर्क से जुड़ी हुई सेवाएं सभी के लिए उपलब्ध भी हैं। अगर समझ न आए तो अपने आसपास के जानकार से बिना झिझक पूछा भी जा सकता है। मुसीबत कभी कहकर नहीं आती मगर जानकारी मिलने से उससे बचाव के उपाय ढूंढना आसान हो जाता है।
अभी हमारा पूरा संसार इस संक्रमित महामारी के प्रकोप से घिरा है । उचित दूरी का पालन हमारे अपने हित में भी है और संक्रमण रोकने में भी आवश्यक। स्वच्छता का कितना बड़ा योगदान है, अब इसका पता साफ चल रहा है। बीमारी के संक्रमण को गंदगी से ही बढ़ावा मिलता है।
सामूहिक सुरक्षा की आड़ में हम अपनी सुरक्षा भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते । स्वयं का भरण-पोषण हमारा अपना भी कर्तव्य है। और इसके लिए हमें भेड़ बकरियों की तरह मिमियाना बंद करना होगा।
लॉक डाउन अनंत काल तक नहीं रह सकता। यह महामारी है और अपनी सुरक्षा के लिए हमारी अपनी भी कुछ जिम्मेदारी है हां, कोरोना है तो इलाज के लिए अस्पताल जरुर जाएं और यथोचित सावधानियां बरतें । सरकार ने बहुत सारी सुविधाएं जुटा रखी हैं, मगर फिर भी ये हमारी उम्मीद से कम हो सकती हैं। हमें उनकी सीमाओं को भी समझना होगा। गाली देना बहुत आसान है मगर गहराई से इसे समझना बहुत मुश्किल।
हे ईश्वर,
संकट की इस घड़ी को अब तू ही फास्ट फॉरवर्ड कर दे।
:प्रेम सिंगी(दिल्ली)
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