🌺वजह
ढ़लकर शामें...
तुम्हारे बाज़ुओं से...
इक नई सुबह को...
जन्म देती हैं !
और गुज़र कर...
रात के मुसाफ़िर...
इक नये सफ़र को...
निकलते हैं !
मैं तुम्हारे बिना...
इक मायूस ग़ज़ल
तुम मेरे बिना... इक उदास नज़्म !
रंगों की हसीन वादियाँ...
मेरे साये...
वहीं कुदरतन ख़ूबसूरती...
तुमसे है !
कोई और न यहाँ मेरे...
तुम्हारे बिना ,
के ग़र कुछ है तो वो... बेवजह सा है !
जैसे बहारों का होना...
तुम्हारी इक ज़रूरत...
और मेरा ,
तुम्हारे बिना होना
ज़िन्दगी ,
एक मशक़्क़त ...
मेरे सरताज
❤
:निर्मला सेवानी
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