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किस्से बाबागिरी के....

#बाबागीरी_और_स्त्रियों का शोषण 


पहला किस्सा 
“मैं तुमसे प्यार करता हूँ।” 
यह उसने कहा जिसे वह भगवान मानती थी। वह कुछ जवाब देती उसके पहले ही वह बोला-
“मैं तुम्हारे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर देना चाहता हूँ। यूँ भी तुम मेरे लिए मन वच तन से समर्पित हो।” 
वह समझ ही नहीं पाई कि क्या करे क्या कहे, वह सोच ही रही थी कि उनके होठ पहले उसके गाल पर आये और फिर उसके होठ पर आ गये। वह अभी तक सदमे में थी मगर वह अपने काम में लग गया था। जब तक वह लड़की सदमे से बाहर आती तब तक वह अपना काम कर चुका था। 
वह जब संभली तो उसने कमरे से बाहर जाकर सबको सच बताने के लिए कहा तो वह तथाकथित बाबा जोर जोर से हँसने लगा। उसने तुरंत कोने में पड़ी घड़ी उठाई जिसमें हिडन कैमरा था और साथ में मेमरी कार्ड, खुद को उसके साथ इस मुद्रा में देख, (जिसमें केवल वह दिख रही थी उस बाबा का चेहरा नहीं) जिसे भगवान माना था वह लड़की खून के आँसू रोने लगी। या तो वह बदनाम हो सकती थी या उसे बदनाम करने के नाम पर भी वह खुद ही बदनाम हो सकती थी। 

क्या करती वह, बदनामी का डर, क्योंकि जानती थी कि इनके भक्तों की कतार इतनी लम्बी है कि कोई उसकी बात पर विश्वास ही नहीं करेगा। 
ऐसा वह इसलिये जानती 
थी कि क्योंकि एक वर्ष पहले वे जिस नगर में थे उस नगर की एक लड़की ने भी उनके ऊपर ऐसा ही इल्जाम लगाया था मगर तब विरोध करने वालों में वह प्रथम कतार में थी। वह सोच भी नहीं सकती थी कि प्रति पल परमार्थ की बात करने वाले, ब्रह्मचर्य के फायदे गिनाने वाले किसी लड़की का अहित कर सकते हैं। 
तब उस पीड़ित लड़की को पूरी समाज ने मिलकर बहुत प्रताड़ित किया था, साधू के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए उस पर समाज से रिश्ता रखने पर पाबंदी लगा दी थी, उसने भी तो दिल खोलकर इस निर्णय का स्वागत किया था क्योंकि वह लड़की उसके प्रभु के खिलाफ बोल रही थी। 
सन्न रह गई वह आज, कैसे वे लोग उसकी बात को सच मानेंगे जो उसी की तरह उन तथाकथित साधू पर अंधविश्वास करके उसके अंध भक्त बने हुये हैं। 

दूसरा किस्सा 
“बाबाजी बहुत परेशान हूँ, क्या करूँ पति और बच्चों से बहुत परेशान हूँ, बिल्कुल शांति नहीं है।” 
“अऱे इन सबसे बचाने के लिये ही तो हम है यहाँ पर। कल दोपहर में मेरे कमरे पर आना, ऐसा ताबीज दूंगा कि तुम्हारी सारी समस्याएँ दूर हो जायेगी। हां, पर किसी को बताकर मत आना नहीं तो ताबीज काम नहीं करेगा।” 
“हाँ बाबा, जैसा आप कहे, मैं ऐसा ही करूँगी।” 
दूसरे दिन ताबीज पहनाने की आड़ में पहले छेड़छाड़ और फिर शायद लड़की किस्मत का अच्छा होना कि समाज के किसी व्यक्ति का वहाँ उपस्थित हो जाना। 

रंगे हाथों बाबा पकड़े गये मगर यह क्या, न एफ आई आर न कोई शिकायत दर्ज। समाज का निर्णय़ कि हमारे समाज के संत है धर्म बदनाम होगा इसलिए इन्हें अभी का अभी यहाँ से विदा किया जाये। बाहर किसी औऱ समाज में जाकर जो मर्जी वैसा करे पर हम यहाँ इन्हें नहीं रख सकते। 
और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया मगर इससे उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। जानते हैं क्यों क्योंकि उस समाज में ऐसे कई लोग थे जिनके ऊपर अंध भक्ति की इतनी मोटी पट्टी चढ़ी हुई थी वे उसे उतार ही नहीं पाये। 
दूसरी समाज को उनके कारनामे बताये नहीं गये क्यों, क्योंकि धर्म के संतों की करतूतो को उजागर नहीं करना चाहिये छिपाना चाहिये। छिपाने से ही तो धर्म बचा रहेगा। धर्म पर आंच नहीं आय़ेगी। हाँ दूसरी समाज की लड़कियों की इज्जत से यह तथाकथित संत से जाकर वैसे ही खेलेगा तो कई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि बहू बेटियों का मान सम्मान दाँव पर लग सकता है धर्म पर आँच नहीं आनी चाहिये। 

तीसरा किस्सा 
“बाबा मैं माँ नहीं बनी बहुत परेशान रहती हूँ।” 
“तुम्हारे पति में ही दोष है, मैं तुम्हारी मदद तो कर सकता हूँ पर उपाय थोड़ा अटपटा है।” 
“अरे कितना भी अटपटा हो बाबा, बस मुझे कैसे भी माँ बना दीजिये, मैं आपके चरण धो धोकर पीऊँगी।” 
“हाँ, मैं ऐसा कर सकता हूँ। बस कल मेरे कमरे पर अकेले आना।” 
दूसरे दिन माँ बनाने का बाबाजी का उपाय उसके साथ यह कहकर बलात्कार करना था-
“मैं ब्रह्मचारी हूँ, सोच के देखो, तुम मेरे साथ सहवास करोगी तो तुम्हारी संतान कितनी तेजस्वि होगी।” 

स्त्री चौंक जाती है, तो क्या यह अटपटा तरीका था। वह कुछ समझ पाती है उसके पहले ही उसके साथ बलात्कार हो जाता है।  
यह हिम्मत करके अपने पति को बोल देती है। पति समाज को बोलता है और समाज, बाबा को। बाबा मान लेते हैं कि उन्होंने गलत किया है पर धर्म का वह चोला उतारने तैयार नहीं होते जो जिसके नाम पर वे दुनिया में पूजे जा रहे थे। यहाँ भी समाज उन्हें सहूलियत देना चाहती है कि आप यहाँ से विदा हो जाओ, बाहर जाकर करना अब जो करना है पर इस बार उस पति की इंसानियत दूसरे नगर में रहने वाली स्त्रियों के लिये जाग उठती है औऱ वह पुलिस में केस दर्ज करा देता है।
समाज वाले लोग लगातार विरोध करते हैं मगर वह टस से मस नहीं होता। बलात्कार साबित हो जाता है तब भी अंध भक्तों की भीड़ उस सज्जन के विरोध में खड़ी रहती है। उस संत के लिए भक्ति का पर्दा कदाचित् आँख से उतर भी जाता है तो उस धर्म से नहीं उतरता जिसका पालन किया जा रहा है। 
अब भी यही कहा जाता है कि उसकी बदनामी करने से समाज की बदनामी होगी, धर्म की बदनामी होगी बात को रफा दफा कर दिया जाना चाहिए। 
मेरे जैसा कोई इन संतों की करतूतों को उजाकर करके समाज में जागरुकता फैलाना चाहता है तो भी समाज कहती है-
चुप रहो, जो हो गया उसे दबा दो, धर्म की बदनामी होगी। 

बहुत सारे सवाल है जेहन में-
आप सबसे मुझे जवाब चाहिये। क्या समचमुच कोई भी धर्म इतना कमजोर है कि ये ऐसे ढोंगी लोग उसे बदनाम कर देंगे या उसके महत्तव को कम कर देंगे। 
क्या सचमुच साधू का चोला पहनकर मानव मानवीय अवगुणों से इतना ऊपर उठ सकता है कि हम उन पर अंध श्रद्धा करके स्त्रियों को गलत समझ ले। 
क्या किसी भी समाज को यह हक है कि वह अपनी समाज से ऐसे साधुओं को बाहर करके दूसरी समाज को जोखिम में डाले। 
और अंत में सबसे महत्तवपूर्ण सवाल-
क्या किसी भी धर्म की महिलाओं को इन साधू संतों की बातों में आकर या इन पर अंध श्रद्धा रखकर इनके इतने करीब जाना चाहिए। 
मैं कतई नहीं कह रही कि हर एक साधू गलत होता है पर इतना जरुर कहूँगी कि इनकी करतूतों पर जब पर्दा डाला जाता है तो साधू के वेश में घूमने वाले शैतानों का हौसला बढ़ता है। वे खुलकर ऐसे काम और अधिक आजादी के साथ करने लगते हैं।

यह भी कहना चाहूँगी कि जो खास होता है उसे खास अधिकार मिलते हैं तो क्या उसके कर्त्वय भी खास नहीं होने चाहिए और उसकी गलतियों की सजाएँ भी क्या आम से अधिक नहीं होनी चाहिए। 
लेकिन नहीं साहब, हम तो इन्हें आम जितनी सजा ही नहीं देते, अपने धर्म को बचाने की आड़ में हम इन्हें ऐसे कुकृत्य करने की खुली आजादी दे देते हैं और यह निहायत गलत हम करते आ रहे हैं। 
समाज कोई भी धर्म कोई भी हो, मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। हम आज धर्मों की प्रभावना में असर पड़ने के नाम पर इन साधुओं का जितना बचाव करने लगे हैं उतने ही ये साधू अपनी मनमानी करने लगे हैं।
जिसे धोड़ा अच्छा बोलना आता है, वह साधू बनने के लिए आज तैयार बैठा है क्योंकि जानता है उस चोले की आड़ में सबसे अधिक पथभ्रष्ट हुआ जा सकता है औऱ पकड़े जाने पर बचा भी जा सकता है। 
आज कोई भी धर्म इन साधुओं से अछूता नहीं है। कारण यही हे कि समाज इनके खिलाफ उतने सख्त निर्णय एकजुट होकर लेती ही नहीं है जितने लिये जाने चाहिए। 

मेरा निवेदन खास तौर पर समाज के पंचों से है कि वे इस गंभीरता को समझे और महिलाओं से कहना चाहूँगी की वे इनके करीब न जाये। कोई साधू आपके दुखों को दूर नहीं कर सकता। आप किसी काउंसलर से, किसी डॉक्टर से सम्पर्क कर ले, वह आपको किसी मंदिर में लाखों का दान करने के नाम पर ठगेगा नहीं और जिनता खर्च होना चाहिये उसमें आपका इलाज कर देंगे। 

बहुत लड़कियाँ अपने आप को इनके आगे स्वाहा कर चुकी है, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, अब भी हमें संभल जाये तो इस तरह से देश को पथ भ्रष्ट होने से तो बचा ही सकते हैं...........
:बबिता कोमल(नल बाड़ी-आसाम)

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