कविता:जो हालातों को न समझे -तब क्या कहना
दौलत
की दौड़ में
जो बेच रहे जमीर
तब क्या कहना
कुर्सी के लिए
जो बन रहे
सियासत की जंजीर
तब क्या कहना
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धर्म के नाम पर
पाखंडों के ब्रांड से
जो हो गए अमीर
तब क्या कहना
समाज की संस्थाओ में
आप देख लीजिए
सियासत की नजीर
तब क्या कहना
जिसके पास है दौलत
जो दे सके अनुदानों की रसीद
पदवी,सम्मान रहेंगे उसके करीब
तब क्या कहना
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परिधान धर्म के पहन
वो पा लेते है
सब कुछ लजीज
तब क्या कहना
दौलत की खनखनाहट पर
उसके सारे ऐब छिप जाते
वो लगते मर्यादा की लकीर
तब क्या कहना
जब हो कोई दिल के करीब
और न रूठे जैसे
रूठ जाता नसीब
तब क्या कहना
जो हालातो को
न समझे
चाहे हो वो वजीर
तब क्या कहना
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धर्म की जाजम पर
सियासत की कालिख
और नही सहना
तब क्या कहना
नारी देवी का रूप कहते है
और
शोषण,उत्पीड़न करते है
तब क्या कहना
स्वच्छता अभियान चलाते है
और पान की पीक
सड़क पर गिराते है
तब क्या कहना
लोगों के रुपये
देने न पड़े
इसके लिए हाथ उठाते है
तब क्या कहना
गठबंधन सियासत का
धर्म मे
दिख जाए
तब क्या कहना


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