ओ मेरे सरताज
गिलास-ए-शर्बत🌺
ज़ेहन ए
बेवजह मशक़्क़त के दरमियाँ यदि तुम आ मिलो...
तो यक़ीनन
इससे ज़्यादा,
इस ज्येष्ठ दोपहर में
ठंडक शायद
कही ओर न मिले..
मैं पिघलतीं हूँ,
घुलती हूँ ,
कुछ पल को तुममें ऐसे..
जैसे गर्मी में बर्फ़ पिघल कर ,पानी बन मिल जाती है ,नदियों और सागर में..
गर्मी से राहत के लिये..
रूह अफ़जा के घूँट अकेले नहीं जाते
अन्दर ,
बल्कि जाता है वो सब तुम्हारा प्यार ,यादें ,वो पल जो हमने तकरारें कर गुज़ारे जिन्हें मैं बेमक़सद अपने दिल में लिये फिरतीं हूँ ..
और शर्बत गिलास के ख़ाली होते होते दिन मेरा
तेरी रिक्त
मुस्कुराहट से भर जाता हैं..
और
भले ही कुछ देर के लिये ,
सुर्ख़ हो जाता है ..
मेरा चम्पई रंग,
तेरी शख़्सियत के उजाले में..
ओ मेरे सरताज...❤️
:निर्मला सिवानी
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