Skip to main content

बेटे से मिलने आया था

बाबा बोला-रुपये लेने नही- बेटे से मिलने आया था

जीवन की भागम भाग में रिश्ते टूट रहे है- संवेदनाएं चूक रही है--दायित्व भूल रहे है--दौलत- शौहरत की दौड़ में हमसे हमारे अपने छूट रहे है तब उस अहसास को जगाने के लिए कोई घटना,कहानी प्रेरक बन सकती है और बिछड़े उन अपनो तक हमे फिर ला सकती है--एक ऐसा प्रयास इस कहानी के माध्यम से आप तक पहुंचा रहा हूँ।अगर कहानी को पढ़ते पढ़ते आंखों से आंसुओं के मोती टपक जाए- गला रुंध जाए तो कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा ताकि फिर कलम इस डगर पर संवेदनाओं को जीवंत करने के लिए चल पड़े और कलम धर्म को सार्थक कर सकू।

साभार- सोशल मीडिया

कलक्ट्रेट के बाहर हमेशा की तरह आज भी बड़ी भीड़ थी-जिलाधीश रामलाल के चैम्बर के सामने कई पुलिस अधिकारी,सुरक्षा गार्ड व जिलाधीश से फ़रियाद करने आये क्षेत्र के लोग काफी संख्या में थे--एक के बाद एक फरियादी को बुलाया जा रहा था और बीच बीच मे कुछ अधिकारी भी भीतर बाहर आ जा रहे थे

अचानक एक बुजुर्ग ने सबका ध्यान अपनी और खींच लिया जो लाठी के सहारे से चलते हुए तेज गति से ठक ठक करते हुए आ रहे थे तथा रास्ते मे एक पुलिस अधिकारी को उन्होंने कागज दिखाते हुए पूछा कि मेरे रामु का दप्तर कौनसा है! बुजुर्ग की आवाज बुलंद थी इसलिए जिलाधीश के चेम्बर के सामने बैठे लोगों को साफ सुनाई दे रही थी।

पुलिस अधिकारी रामु नाम को नही समझ सका इसलिए उसने उन बुजुर्ग को जिलाधीश के चेम्बर के सामने खड़े अर्दली तक भेज दिया- अब वे बुजुर्ग अपने उसी ठेट गांव के अंदाज़ में पूछने लगे कि अरे मेरे रामुडा का दप्तर कौनसा है!

अर्दली ने कहा बाबाजी धीमे बोलिये-जिलाधीश जी का यह चेम्बर है - साहब तक आवाज चली जायेगी तो--

भाई मुझे तेरे साहब से क्या मतलब -मैं तो अपने रामु का दप्तर खोज रहा हूँ- बुजुर्ग ने अर्दली को जबाब दिया।

अर्दली बोला-- बाबा यहां कोई रामु नही बैठता--

तब क्या मुझे इस कागज़ पर झूठ लिख कर दिया है कि मेरा बेटा कलेक्टर है---

अब अर्दली और वहां बैठे सभी लोग जो इस वार्तालाप को गौर से सुन रहे थे-सब चोंक गए। अर्दली ने फिर गौर से कागज और उस बुजुर्ग को देखा और बोला बाबा यह जिलाधीश रामलाल जी का कार्यालय है।

अरे जिलाधीश रामलाल तुम्हारे लिए होगा- मेरे लिए तो मेरा रामु ही है-बुजुर्ग की आवाज में एक गहरा विश्वास था।

अब अर्दली ने कहा बाबा आपका नाम बताइए-पर्ची बनाने के बाद साहिब तक भेजी जाएगी--

किसकी पर्ची! उसको जा कर कहो कि तुम्हारा बापू आया है--लो यह कागज दिखा देना इसमे मेरा लिखा देख कर ही समझ जाएगा और अभी दौड़ा हुआ आएगा मेरा रामु।

बाबा की आवाज में अपने बेटे के लिए विश्वास जबरदस्त बोल रहा था पर अर्दली अभी कशमकश में था कि वास्तव में यह बाबा साहिब के पिता जी ही है या कोई गलतफहमी हो रही है जिस रामु को ये खोज रहे है वो कोई और है।

पर बाबा की आवाज,अंदाज से वो नकारने की हिम्मत भी नही कर पा रहा था इसलिए बाबा को बिठाकर वो साहिब के कक्ष में गया और वो कागज देकर आ गया -बाबा बोले कि क्या हुआ--रामु ने मेरा कागज देख लिया!

नहीं- मैने साहिब की मेज पर रख दिया है पर साहिब अभी व्यस्त है जब देखेंगे तब आपको बता दिया जाएगा।

अब कमरे से जब ही घण्टी की आवाज आती -बाबा तैयार हो जाता-बेटे के कक्ष में जाने के लिए पर अर्दली क्रमश: फरियादी को एक के बाद एक बुला रहा था-बाबा को इस इंतजार में करीब 20- 25 मिनट हो गए थे उनके चेहरे पर बेचैनी साफ दिख रही थी वो कभी अपने बेटे के कक्ष की तरफ देखते तो कभी वहां अपनी बारी का इंतजार करते लोगों को देखते-एक बाप को अपने बेटे से मिलने के लिए इस तरह बैठना पड़ेगा उन्होंने सपने में भी नही सोच था

अचानक घण्टी हुई- अर्दली कक्ष के अंदर घुसा और इस बार बाबा वाली पर्ची हाथ मे थी और साथ मे एक लिफाफा भी था-बाबा के एकदम करीब आ कर बोला कि साहिब ने आपके लिए यह लिफाफा दिया है और आपको गांव जाने के लिए कहा है-वे खुद 2- 3 दिन में गांव आपसे मिलने आ रहे है।

बाबा अर्दली की बात सुनकर रुआंसा सा हो गया-कभी अर्दली को देख रहा था तो कभी लिफाफे को -आखिर बेटे ने इस लिफाफे में क्या संदेश दिया है वो जानने के लिए जब बाबा ने लिफाफे को खोला और उसमे 500 के कुछ रुपये देख कर बाबा की आंखों में पानी आ गया-देखते ही देखते आंसू उस लिफाफे पर गिरने लगे।

बुलंद आवाज वाले उस बाबा की आवाज भरा गयी थी लगभग सुबकते हुए अर्दली से बोला कि जाकर अपने साहिब से कह दो कि एक बाप अपने बेटे से मिलने आया था रुपये लेने के लिए नही--

और बाबा उठ खड़ा हुआ इस वक्त बाबा के पैर कांप रहे थे--जो बाबा आते वक्त बड़े रबाब और विश्वास के साथ लकड़ी पटकते हुए तेज रप्तार से आया था वो बाबा अब ठीक से खड़ा नही हो पा रहा था शायद उसके विश्वास की छड़ी टूट गई थी-

-अर्दली सहित वहां बैठे सभी के दिल द्रवित हो गए-वे बाबा को बिठाने की कोशिश करने लगे पर बाबा अब वापसी के लिए धीमे धीमे आंखे गमछे से पोंछता चल पड़ा- था- उधर अर्दली अब स्वयं तेज गति से साहब के कक्ष में यह संदेश देने चला गया था--

बाबा कुछ कदम चलकर रुक गया -पीछे मुड़कर अपने बेटे के कक्ष की तरफ देखा शायद उसे यह विश्वास नही हो रहा था कि कंधों पर खिलाये उसका रामु उससे मिलने तक नही आएगा--बड़ा अफसर बन गया तो क्या---वो अपने बाप को भूल जाएगा!

बूढ़ा बाप अपने ही सवालों में खोया फिर चल पड़ा-कलेक्ट्रेट का रास्ता लंबा था पर लोगों के बीच मे यह सुगबुगाहट हो गई थी कि ये बाबा जी साहब के पिताजी है--आंसू पोंछते बाबा को थके कदमों से जाते देख कर कुछ लोगों की आंखे भी भर आईं थी पर साहब को भला कौन कहे--कि यह आपने क्या किया!

अचानक सब देख कर आश्चर्यचकित हो गए--जिलाधीश महोदय अपने कक्ष से लगभग दौड़ते हुए बाहर निकले और अपने बाबा को दूर जाते देख वही से आवाज लगाई "बापू रुक जाओ" --

बाबा ने जैसे ही अपने बेटे की आवाज सुनी वो पीछे मुड़ा---उसका रामु तेज गति से उसकी तरफ आ रहा था और देखते ही देखते रामु उर्फ जिलाधीश रामलाल अपने बापू के कदमो पर गिरे थे और हाथ जोड़कर माफी मांग रहे थे।

बाप ने अपने बूढ़े हाथों से अपनी लाठी अर्थात बेटे को उठा कर अपनी छाती से लगा लिया था--बाप- बेटे के उन आंसुओं में भारतीय संस्कृति की भावनात्मक पुकार का मिलन हो गया था।

जिले का मालिक अपनी एक भूल की वजह से अपने पिता से रोते हुए माफी मांग रहा था--कलेक्ट्रेट बाप बेटे के मिलन और इस रिश्ते की गहराई की मिसाल बन गई -सारे अधिकारी अपने इस अफसर पर गर्वित थे--सबकी आंखों आंसुओं से भरी थी पर मन मे कही न कही खुशी थी और इस मिलन ने उन सबके अपने दायित्व का भी बहुत गहरे से बोध करा दिया था--सब देख रहे थे जिलाधीश रामलाल अपने बापू का हाथ पकड़ कर अपने कक्ष की तरफ ला रहे थे।

प्रिय पाठक -अगर आपको कहानी भावनात्मक रूप से पसंद आई तो कृपया लाइक,शेयर,व फॉलो के बटन पर क्लिक करना न भूलिएगा- कमेंट बॉक्स में आपके विचारों का स्वागत रहेगा---

संजय सनम


Comments

Popular posts from this blog

कही पर दिल लगाया जा रहा....

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण की महत्ता को जानिये   SANJAY SANAM Author + FOLLOW जैन धर्म की संस्कृति में प्रतिक्रमण की जो महत्ता है उसके कारण क्या है--इस प्रतिक्रमण की परंपरा की जय दर्शन में आगम सम्मत व्याख्या में सवाल जवाब के क्रम से आप तक पहुंचा रहे है- यह हमको जैन दर्शन के विद्वान श्री रमेश जैन सांगली के दुआरा संचालित व्हाट्स एप समूह से मिला है।यह जानकारी मूल्यवान है क्योकि इसके अंदर सवालों के तार्किक समाधान दिए गए है जो जैन संस्कृति की आत्मा को परिभाषित करते है। इनको समझने के साथ फिर जैन संस्कृति की गहराई को समझना भी आसान हो जाता है और हमको भी अपने जीवन को समझने के अनमोल सूत्र मिल जाते है। आइये जैन परंपरा के अनमोल सूत्र प्रतिक्रमण को समझने के लिए जिज्ञासा के समंदर में उतरते है। प्रश्न 1: प्रतिकमण किसे कहते हैं ? Jansatta उत्तर 1: हम अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण करके अपनी स्वभाव दशा में से निकलकर विभाव दशा में चले गए थे तो पुनः स्वभाव रूप सीमाओं में प्रत्यागमन करना प्रतिकमण है। जो पापकर्म मन, वचन, और काया से स्वयं किये जाते हैं, दूसरों से करवाएं जाते हैं और दूसरों के द्वारा किये हुए पाप...

राही की भटकन..

भटकता हुआ राही!! बबीता अग्रवाल कंवल मैं राही! भटकता हुआ राही! मृगतृष्णा लिए भटक रहा हूं, तलाश है जाने किस जहां की ढूंढता हूँ, अंजान हूँ, नाकाम हूँ, हैरान हूँ, परेशान हूँ !! मैं राही! भटकता हुआ राही! माँ की गोद से खुले आंगन में, उन्मुक्तता से विचरण को आतुर। नन्हें हाथों में किरणें सूरज कि हर पल भरने को व्याकुल ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बच्चों के झुंड, हो गए कहीँ गुम चेहरों से खो गए सितारों के भी गुण ! बचपन गंवाया पुस्तक के ढेर में, मिला न वक्त,आँखमिचौली के खेल में। मैं राही! भटकता हुआ राही! मस्ती में डूबा, ज़िंदगी को ढूंढा, कालेज से निकला, नौकरी को भागा। सुकून कि चाह में, गृहस्थी सजाई ज़िंदगी की सच्चाई समझ में न आई ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बनाने की चाह में स्वयं को ही खोया, बच्चों का भविष्य रातों संजोया। लाठी की थाप और झुकी हुई कमर उम्मीद की किरण हो गई बेअसर! मैं राही! भटकता हुआ राही मैं राही! भटकता हुआ राही बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)