तुम मेरी भाषा..🌷
तुम्हारे,
मैं ..
कब से भूल बैठी हूँ
अपनी आवाज़ की पहचान..
भाषा सीखी थी मैंने जो ,
मनुष्य बनने के लिये ..
उसके सारे अक्षर जोड़कर भी
मैं..
बमुश्किल तुम्हारा नाम ही
बना सकी..
बहुत देर हुई,
वर्ण अपनी ध्वनि खो बैठे हैं
साल हुये !
अब मैं लिखती नहीं-तुम्हारे अंगों की सिर्फ़
परछाईं पकड़ती हूँ..
क्या देखा है ,
तुमने कभी
लकीरों को बग़ावत करते ?
मेरे हाथों से
हर अक्षर तुम्हारी तस्वीर
बन उभरता है..
ओ
मेरे सरताज
❤️
:निर्मला सेवानी
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