कविता:जो तन्हा दिलों को करार दे दे
जो महफ़िल में अक्सर होते है
किस्सों कहानियों को सुनते कहते है
जो अहसासों की रवानी समझते है
जो मन की वीरानी भी पकड़ते है
जो तन्हाई को भी शबाब कर देते है
जो बुझे चेहरों को गुलाब कर देते है
महफिल वे ही समझते है---
जो एकाकी दर्द की नब्ज पकड़ते है
जो आंखों से कसक समझते है
जो खामोशी से बात कर लेते है
यारों की संगत दे कर
जो कशमकश को समाधान दे देते है।
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कुछ ऐसी अपनत्व की महफिल में
दिल को जवां बना कर
चले आइये---
समझदार नही
खुद को नादान
बना कर चले आइये---
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क्योकि महफिल
होती वो है
जो तन्हा दिल को
करार दे दे
दिल के तूफानों को
जो जवाब दे दे
कांटो भरे बीहड़ में
जो गुलों का हार दे दे
पतझड़ के मौसम में
जो सावन की बहार दे दे।
---संजय सनम


वाह, दिल को छूने वाला शायराना अंदाज
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना। बहुत-बहुत बधाई।
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