कविता: इशारों से जो समझे उन्हें बोल कर क्या कहना
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जो बाते दिल की है
उन्हें जमाने को क्या कहना
जो नजरों में खुमारी रखते है
उन्हें मयखाने का क्या कहना
हमे मोहब्बत की लत लग गई
अब इस आदत का क्या कहना
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लोग चाहते है कि हम आशिकी छोड़ दे
पर वो न छोड़े हमे तो बोलो क्या कहना
जो नजर खोजती है अपनी राहों में
हम न आये तो फिर वफ़ा का क्या कहना
बदनाम हुए तो लोग जानने लगे है
ऐसे शौहरत के मुकामो पर क्या कहना
अब हमारी फितरत पर न आओ तुम
तुम्हारे इन बहानों पर क्या कहना
खुदा का शुक्र है कि हमारे सर कोई इल्जाम नही है
फिर भी है मुजरिम दिल की अदालत में - क्या कहना
जो इशारों से समझते है दिल के बयान
अब उन्हें बोल कर फिर क्या कहना
जिसकी आँखों मे देखी थी अश्कों की बारात
अब उसके हालातों पर और क्या कहना
प्यार करना तो हमने सिखाया था दुनियां को
अब वो उसमे भी करने लगे व्यापार तो क्या कहना
जब खुद चलकर आती है बहारें मेरे पास
खुद को चमन न कहे तो क्या कहना
--- संजय सनम


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