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लज्जा


             
            (लज्जा)
      
लज्जा नारी का गहना है ये शब्द जरूर किसी पुरुष के मुख से ही निकला प्रतीत होता हैं अपनी सहूलियत के लिए वह नारी को लज्जा का गहना हर घड़ी पहनने को मजबूत करता है इसके जीते जागते उदाहरण देखने को मिल जाते है
              पांच वर्षीय लड़की नेहा के पिता जब शराब पीकर आते है तो नेहा सहम जाती है वह उसकी मां के साथ मार पीट करते है गाली गलौज करते है जानवरो की तरह उसकी मां को पीटते है
पर नेहा कुछ नहीं कर पाती क्युकि वह बच्ची है किन्तु उसकी मां वो तो बच्ची नहीं है वो तो परिपक्व है वह भी सब सहन करती है क्युकी पिता अन्नदाता है उसका आदर करना उसकी मजबूरी है लज्जा के कारण वे अपनी जबान बंद रखती हैं नेहा का नाज़ुक मन भी पिता से नफ़रत करता है पर वो विरोध नहीं कर पाती पिता के रूप में वे पुरुष से नफ़रत करती हैं 
             रमा जो  किशोरावस्था में है बचपन से साथ खेलने वाले अपने भाई से परेशान है वे  उसके विकसित होते हुए शरीर पे बुरी नजर रखता हैं वह ये बात जानती है पर किसी को बता भी नहीं सकती कुछ कह भी नहीं सकती कहे तो क्या ? करे तो क्या? जिससे रक्षा की उम्मीद थी जब वो ही..... बस चुप है! सहमी है! लज्जवश विवश है ! वे भाई के रूप में पुरुष में नफ़रत करती हैं 
         जया जो विद्यार्थी है अपने पुरुष अध्यापक की अशलील हरकतों से , गलत ढंग से छूने की वजह से परेशान है वह अपना ध्यान इसी वजह से शिक्षा पे भी नहीं दे पाती सोच सोच के दुखी हैं कि को क्या करें? ये क्या है? क्यू है?  हर रूप में पुरुष उसका दुश्मन है वे किससे कहे विरोध करे ? चार उंगलियां अध्यापक पे उठीं तो एक दो उंगलियां उस पे भी उठ सकती है बदनामी के डर से चुप है समाज क्या कहेगा? पर अध्यापक के रूप में पुरुष से नफ़रत करती है
           अगला किरदार है रेखा" रेखा" की मां की मौत हो चुकी है उसकी तीन बहनें ओर भी है रेखा सबसे बड़ी है यौवन अवस्था में है वो भी अपने ही सगे पिता की बुरी नजरो की शिकार है कहा जाए? किससे कहे? जनमदता ही जब.......... क्या बित्तती होगी रेखा के नाज़ुक से मन पे उसका मन लाख बार हजार बार कोसता होगा ऐसे पिता को! वो रोती है पर आसू पूछने वाला भी कोई नहीं मन में इतनी उधल पुथल की आत्महत्या की भावनाएं मन में आती हैं पर आत्महत्या कर भी ली तो कारण कोई नहीं जान पाएगा कि वजह क्या थी? मन में नफ़रत है घोर नफ़रत बस एक ये ही चीच है जो वो कर सकती है नफ़रत है ऐसे पुरुष से जो दुर्भाग्य वश उसका पिता है
             अगला किरदार है "हेमा" हेमा एक शादीशुदा युवती है उसके दुश्मन के रूप में उसके "पति के पिता " है वे उनकी गलत हरकतों से परेशान है पर क्या करे हेमा? कुछ कहे तो  घर टूटता है पति मन की भावनाओ को समझने वाला है पर ऐसी भावनाए पति को समझाए तो केसे ? क्या के उससे की ...... बस चुप है क्युकी यही सिखाया है नारी की चुप रह के सब सहना ! नारी को सहनशीलता की देवी कह के संबोधित करने वाला भी अवश्य कोई पुरुष ही रहा होगा हर किरदार में पुरुष नफ़रत का पात्र है        
           अगल किरदार सुषमा का है उसका पति चरित्रहीन है वो ये बात जानती है कि उसके किसी और के साथ भी गलत संबंध है किंतु फिर भी वो खामोश है अंदर ही अंदर घुलती है पर चुप है समाज के सामने उसके सुख दुख की भागीदार है किन्तु अंदर से टूट चुकी है बस जी रही है क्युकी विरोध करने की हिम्मत नहीं है ! पति के रूप में वे ऐसे पुरुष से नफ़रत करती हैं     
         इसी तरह चाचा, मामा, ताया फूफा अनेक उदाहरण मिल जायेगे हमारे समाज में जो किसी भी रिश्ते का मान नहीं रखते है नारी कही सुरक्षित नहीं है ना घर में ना बाहर पर पुरुष फिर  भी समाज  में पूजनीय है उसकी पूजा होती है व्रत त्योहारों में प्राथमिकता प्रदान कि जाती है! इतना आदर पुरुष का ओर इतना निरादर नारी का?? इतना निरादर अपनो के ही हाथों.... पर क्यों करती है नारी इतनी लज्जा ? किसके लिए? नारी को अब चुप रह के अपने पे हो रहे अत्याचारों के खिलाफ मुंह खोलना होगा नहीं तो ?नहीं तो ? ऐसे ही  घुट घुट के मरना होगा....... 
              लेखिका
            " सुमन राघव"

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