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नवरात्र...ऋतु परिवर्तन का सन्धिकाल (निर्मला सेवानी)

:
शारदीय नवरात्रि माने वर्षा ऋतु का समाप्ति और शरद ऋतु का आगमन..

इन दिनों प्रकृति में गुणात्मक ऊर्जा का संचार अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक तेज़ी से होता है इस नव संचरित ऊर्जा का उपयोग कर हम स्वयं को नव पल्लवित कर अपने जीवन एंव आस-पास को परिष्कृत कर अपनी देह को स्वस्थ रख सकते है मन स्थिति को शांत रख सकते है बुद्धि को तीव्र कर अपने जीवन के सही निर्णय ले सकते है व अपने पराक्रम पुरूषार्थ से पदार्थों की सृष्टि कर हम स्वयं को न केवल इस लोक में प्रतिष्ठित कर उस आलोक में स्वयं को विस्तार दे सकते है...
पहले तीन नवरात्र रज गुणात्मक ऊर्जा के होते ,जिससे पदार्थ की सृष्टि होती है इन दिनों हम माँ महालक्ष्मी की आराधना कर देह व वित सम्बन्धी पदार्थ को आकृष्ट करते है जैसे...अन्न धन वाहन पराक्रम ऐश्वर्य कीर्ति वैभव आरोग्य इत्यादि ..!

४,५,६ नवरात्रि सत्वगुण ऊर्जा से परिपूर्ण होती है इन दिनों माँ वीणावादिनी की उपासना की जाती है जो वाक् सिद्धि ,विद्या , बुद्धि व समस्त कलाओं की अधिष्ठात्री है यशदायिनी है तेजोमय है जो हमारे आभामंडल को परिष्कृत कर इस लोक में प्रतिष्ठित कर उस आलोक में विस्तार देती है इन दिनों हम अपने जीवन होने के अर्थ को समग्रता से समझ अपनी अन्तर्श्चेतना को जागृत करते है..!
७,८,९ नवरात्रि तमोगुण प्रधान है जो जीवन में संघर्ष ,अदम्य साहस की प्रवृत्ति की अधिष्ठात्री है तम गुणात्मक ऊर्जा न केवल हमें बाहरी शत्रु का नाश करना सिखाती है अपितु हमारे अंतस के शत्रु जैसे क्रोध ईर्ष्या द्वेष चिन्ता भय संताप इत्यादि से भी मुक्ति देती है..ताकि हम अपनी जीवनदायी तम शक्ति का उपयोग अपने आत्मशोधन हेतु कर सके..और अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर स्वाभिमान से ,आत्मविश्वास से जीवन का उपयोग अपने ,अपने परिवार,समाज और देश के हित में कर सके ..!

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