दिन वो भी खास था
दिन यह भी खास है...
अगर वो दिन(15अगस्त1947) न आया होता
अगर वीर शहीदों ने अपनी शहादत की आहुतियां दे कर देश को फिरंगियों से आजाद न करवाया होता तो फिर आज का दिन आजाद देश का संविधान नहीं लिखा जाता।
इसलिए पहला सम्मान उन अमर शहीदों के नाम जिनके खून की कीमत पर आजादी मिली थी।
दूसरा सम्मान उन मनीषियों के नाम जिनकी दूरदृष्टी की बदौलत देश का संविधान मिला था और देश को गणतंत्र का आधार मिला था और विश्व मे एक नया मान मिला था।
पर अफसोस हम न तो शहीदों की शहादत का ख्याल रख पाए है..
न ही मनीषियों से दिए संविधान का सम्मान रख पाए है!
इस देश को वक्त वक्त पर बाहरी लोगों ने लुटा
पर तब क्या कहे अपने भी उनसे बदतर निकले...
अब निर्णय कीजिए क्या हम हमारे राष्ट्रीय पर्वों को उनकी मर्यादा,गरिमा के अनुरूप मन से मनाते है या ओपचारिक हो जाते है....?
आज का दिन क्या मन को टटोलने का नहीं है!
माफ़ कीजिएगा गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ एक कड़वा सवाल रख रहा हूं।
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