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हम शब्दों के पुजारी है..संजय सनम की कविता सुनिए....

हम शब्दों के पुजारी....हमे सौदागर मत समझना...
कलमकार किसे कहते है!
यह रचना कुछ यह आपको बताने का प्रयास कर रही है....
इस लिंक पर क्लिक कीजिए और भावनाओं के समंदर में गहरे उतरिए
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निवेदक
संजय सनम
7278027381

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कही पर दिल लगाया जा रहा....

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण

जैन धर्म मे प्रतिक्रमण की महत्ता को जानिये   SANJAY SANAM Author + FOLLOW जैन धर्म की संस्कृति में प्रतिक्रमण की जो महत्ता है उसके कारण क्या है--इस प्रतिक्रमण की परंपरा की जय दर्शन में आगम सम्मत व्याख्या में सवाल जवाब के क्रम से आप तक पहुंचा रहे है- यह हमको जैन दर्शन के विद्वान श्री रमेश जैन सांगली के दुआरा संचालित व्हाट्स एप समूह से मिला है।यह जानकारी मूल्यवान है क्योकि इसके अंदर सवालों के तार्किक समाधान दिए गए है जो जैन संस्कृति की आत्मा को परिभाषित करते है। इनको समझने के साथ फिर जैन संस्कृति की गहराई को समझना भी आसान हो जाता है और हमको भी अपने जीवन को समझने के अनमोल सूत्र मिल जाते है। आइये जैन परंपरा के अनमोल सूत्र प्रतिक्रमण को समझने के लिए जिज्ञासा के समंदर में उतरते है। प्रश्न 1: प्रतिकमण किसे कहते हैं ? Jansatta उत्तर 1: हम अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण करके अपनी स्वभाव दशा में से निकलकर विभाव दशा में चले गए थे तो पुनः स्वभाव रूप सीमाओं में प्रत्यागमन करना प्रतिकमण है। जो पापकर्म मन, वचन, और काया से स्वयं किये जाते हैं, दूसरों से करवाएं जाते हैं और दूसरों के द्वारा किये हुए पाप...

राही की भटकन..

भटकता हुआ राही!! बबीता अग्रवाल कंवल मैं राही! भटकता हुआ राही! मृगतृष्णा लिए भटक रहा हूं, तलाश है जाने किस जहां की ढूंढता हूँ, अंजान हूँ, नाकाम हूँ, हैरान हूँ, परेशान हूँ !! मैं राही! भटकता हुआ राही! माँ की गोद से खुले आंगन में, उन्मुक्तता से विचरण को आतुर। नन्हें हाथों में किरणें सूरज कि हर पल भरने को व्याकुल ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बच्चों के झुंड, हो गए कहीँ गुम चेहरों से खो गए सितारों के भी गुण ! बचपन गंवाया पुस्तक के ढेर में, मिला न वक्त,आँखमिचौली के खेल में। मैं राही! भटकता हुआ राही! मस्ती में डूबा, ज़िंदगी को ढूंढा, कालेज से निकला, नौकरी को भागा। सुकून कि चाह में, गृहस्थी सजाई ज़िंदगी की सच्चाई समझ में न आई ! मैं राही! भटकता हुआ राही ! बनाने की चाह में स्वयं को ही खोया, बच्चों का भविष्य रातों संजोया। लाठी की थाप और झुकी हुई कमर उम्मीद की किरण हो गई बेअसर! मैं राही! भटकता हुआ राही मैं राही! भटकता हुआ राही बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)